कोविड-19 से निपटने में माइनिंग बेल्ट का 3.1 अरब डॉलर का फंड देश के लिए महत्वपूर्ण संसाधन साबित हो सकता है
भारत के माइनिंग बेल्ट का 3.1 अरब डॉलर के उपयोग वाला फंड कोविड-19 की महामारी के खिलाफ देश की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण संसाधन साबित हो सकता है। खनन मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2015 में एक नया कानून बनाया गया था। डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन फंड्स के पास पिछले पांच साल में जमा राशि का 40 प्रतिशत से भी कम खर्च हुआ है। यानी करीब 23,800 करोड़ रुपए बचा है।
रॉयल्टी भुगतान और अन्य योगदान से बना है यह फंड
यह फंड रॉयल्टी भुगतान के अलावा खनिकों द्वारा योगदान से बनाया गया था। इसे खनन से प्रभावित क्षेत्रों में लोगों के जीवन में सुधार करने के उद्देश्य से गठित किया। इस फंड का इस्तेमाल राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन में बंद कारखानों, मॉल और कार्यालयों के बाद अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए किया जा सकता है। प्रतिबंधों को कम करते ही राज्यों को सुरक्षात्मक उपकरण खरीदने, अपने मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने और नौकरियां पैदा करने के लिए फंड की जरूरत होगी।
धनबाद में कोविड-19 के सात पॉजिटिव केस
झारखंड के धनबाद जिले के उपायुक्त अमित कुमार ने शुक्रवार को कहा कि डीएमएफ खनन जिलों के लिए भारी समर्थन के रूप में आया है। फिलहाल हमारे पास सात पॉजिटिव केसेस हैं। अगर इस संख्या में वृद्धि होती है तो इससे निपटने के लिए हमारे पास धन की कमी नहीं होगी। कुमार ने कहा कि धनबाद ने अस्पतालों में कर्मचारियों की वैकेंसी को भरने और जल, स्वच्छता परियोजनाओं के लिए धन का उपयोग किया है। एक ऐसा निवेश जिसका उपयोग अच्छे काम करने के लिए किया जा रहा है।
कोविड-19 के 1.5 लाख से ज्यादा मामले भारत में
जॉंस हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के आंकड़ों के मुताबिक, 1.3 अरब की आबादी वाले देश में 1.5 लाख से ज्यादा कोरोना के केसेस सामने आ चुके हैं। बुधवार तक 4344 मौतें हो चुकी हैं। इस वायरस का मुकाबला करने के लिए भारत की सरकार ने मार्च में दुनिया का सबसे बड़ा लॉकडाउन किया और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबंधों को आसान करते हुए इसे 31 मई तक बढ़ा दिया। लॉकडाउन का बड़ा आर्थिक दुषप्रभाव पड़ा है।
अप्रैल में 12 करोड़ से ज्यादा लोगों की नौकरी गई
एक अनुमान के अनुसार 12.2 करोड़ लोगों को अप्रैल में अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। इसके अलावा बाजार से डिमांड गायब हो गई है। ब्रुकिंग इंडिया के सलाहकार श्रेष्ठ बनर्जी ने एक रिपोर्ट में कहा, विभिन्न राज्यों और जिलों में डीएमएफ आजीविका के मुद्दे को अब बैकसीट में डालने का जोखिम नहीं उठा सकते। आर्थिक स्थिति की जरूरत को देखते हुए राज्यों और जिलों को इस दिशा में निवेश को किनारे करना चाहिए।
राज्य कम कर रहे हैं खर्च
Oxfam के अनुसार, नौकरशाही बाधाएं, DMF के स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधियों द्वारा ध्यान नहीं दिया जाना, इसके पर्याप्त उपयोग के लिए प्रभावित समुदायों से थोड़ा दबाव जैसी कई परिस्थितियाँ इस परियोजनाओं की धीमी गति के लिए जवाबदेह हैं। खान मंत्रालय के अनुसार, जहां छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्यों ने कल्याणकारी परियोजनाओं पर धन का बड़ा हिस्सा खर्च किया है।ओडिशा जैसे अन्य राज्य ने सबसे अधिक राशि 10,000 करोड़ रुपए एकत्र किया है। इसने लगभग 35 प्रतिशत खर्च किए हैं।
फंड के लिए निगरानी तंत्र की है जरूरत
ऑक्सफैम ने कहा कि विभिन्न कल्याणकारी परियोजनाओं के कार्यान्वयन में पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही की कमी है। सरकार द्वारा ट्रैक किए गए एक अनिवार्य निगरानी तंत्र की आवश्यकता है। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि इन फंड्स को उन परियोजनाओं पर खर्च किया जाए जो समुदायों और उनके स्थानीय पर्यावरण और आजीविका को लाभ पहुंचाते हैं।
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